Wednesday, October 27, 2021

माया नगरी - दौलत और शोहरत के नशे में ड्रग का क्या काम ?

 


माया नगरी का नशा

माया नगरी मुंबई प्राय: किसी न किसी कारण सुर्खियों में रहती है लेकिन उद्धव सरकार बनने के बाद इसका सुर्ख़ियों में रहना आम बात हो गयी है. कहना मुश्किल है कि मुंबई स्वयं  घटनाएं  ढूंढती है या घटनाएं मुंबई का पीछा करती हैं लेकिन इस सत्य को शायद ही  कोई  इंकार करें कि मुंबई बॉलीवुड होने के कारण घटना प्रधान है, क्योंकि यहां झूठी कहानियां गढ़ी  जाती है, झूठे किरदार निभाए जाते हैं, और  कई बार तो सच और झूठ के बीच  अंतर समझना बहुत मुश्किल हो  जाता है. कई बार हत्या को  आत्महत्या घोषित कर दिया जाता है, देश के गद्दारों को महिमामंडित कर देशभक्त बता दिया जाता है. इसी कारण दाऊद इब्राहिम और हाजी मस्तान जैसे कुख्यात अपराधी और  देशद्रोही  राष्ट्र  के  विरुद्ध षड्यंत्र करने में यहीं सफल हुए . प्रत्येक  देशभक्त के लिए इससे दुखद और कुछ नहीं हो सकता कि  बड़ी संख्या में आज भी उनके प्रशंसक फॉलोवर और सहयोगी मुंबई में ऐसो आराम से रह रहे हैं, उनके काले धंधे को गति दे रहे हैं. 

 

वैसे तो भारत के लिए यह  नई बात नहीं है कि  कानून अलग-अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग तरह से काम करता है. यहां पैसा, पद, प्रतिष्ठा और पहुंच के कारण प्राय: कानून लाचार हो जाता है. कानून के रखवाले  भी यहां नमक का दरोगा बनने से डरते हैं. ज्यादातर अधिकारी और कर्मचारी माफिया तंत्र के सामने आत्मसमर्पण करने में ही भलाई समझते हैं,  फिर भी कभी-कभी  संज्ञान में आता है  कि ईमानदार अधिकारी और कुशल प्रशासक आज भी हैं और उन्हें भय और लालच से उनके कर्तव्य पथ से विमुख नहीं किया जा सकता.

 ऐसा ही एक मामला 2 अक्टूबर २०२१ को उस समय आया जब नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने एक क्रूज  में छापा मारकर बॉलीवुड के स्वयंभू और स्वघोषित किंग खान के बेटे आर्यन खान को ड्रग  के विभिन्न मामलों  में गिरफ्तार किया.  स्वाभाविक रूप से हो  हल्ला तो मचना ही था.

भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है जहां नकली नायकों को महानायक, शताब्दी का नायक आदि विशेषणों से अलंकृत किया जाता है और असली नायकों को दरकिनार कर दिया जाता है उनके विरुद्ध अभियान चलाकर अपमानित करने का कुकृत्य किया जाता है. नारकोटिक्स ब्यूरो  ने शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान सहित कई लोगों को हिरासत में लिया और उनसे लंबी पूछताछ की, और पूछताछ से मिली सनसनीखेज जानकारी ने मामले को और भी अधिक गंभीर बना दिया. आर्यन की जमानत याचिका खारिज हो गई और पिछले 20- 22  दिनों से वह जेल में बंद है. इस मामले ने एक बार फिर लोगों को आशान्वित किया कि पैसे से  सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता. जिस समय  मैं यह लेख लिख लिख रहा हूं उस समय आर्यन खान की जमानत याचिका की सुनवाई मुंबई उच्च न्यायालय में चल रही है, और इस बात की  संभावना बहुत ज्यादा है कि उच्च न्यायालय दरियादिली और प्रगतिशीलता दिखाते हुए आर्यन खान को जमानत दे देगा.

 

पूरे मामले ने एक बार फिर पैसे और प्रसिद्धि के काले खेल, मुस्लिम विक्टिम कार्ड के दुरुपयोग, अपराध और राजनीति कि सांठ  गांठ, बॉलीवुड में नशे के कारोबारियों और अपराधियों की सहभागिता को उजागर कर दिया है . शाहरुख खान के प्रशंसकों को तो बिना बुद्धि और विवेक का प्रयोग किए हुए आर्यन खान  का बचाव करना ही था, सो किया  और इसके लिए  सोशल मीडिया पर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो  से लेकर केंद्र सरकार तक  के विरुद्ध  अभियान छेड़ दिया गया. देशद्रोही मानसिकता के लिए कुख्यात महबूबा मुफ्ती, असदुद्दीन ओवैसी जैसे कई मुस्लिम राजनेताओं ने वक्तव्य  दिया कि आर्यन खान को मुस्लिम होने की वजह से भी वेवजह परेशान किया जा रहा है. हद तो तब हो गई जब कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दल शाहरुख खान के पक्ष में लामबंद हो गए और उन्होंने पूरे मामले में केंद्र सरकार को जमकर कोसा. काग्रेस के लोकसभा में नेता अधीर रंजन चौधरी ने तो इस मासूम बच्चे ( 23 वर्षीय आर्यन खान) को तुरंत रिहा करने की मांग की.  




 


      महाराष्ट्र सरकार के एक  घटक राष्ट्रवादी कांग्रेस के  कट्टर मुस्लिम नेता  नवाब मलिक ने तो न केवल मुस्लिम विक्टिम कार्ड खेला बल्कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ( एनसीबी) के अधिकारियों पर वसूली का आरोप भी लगा दिया. उन्होंने एनसीबी  के क्षेत्रीय प्रमुख समीर वानखेडे पर व्यक्तिगत हमले  किये  और उनके पारिवारिक जीवन को कलंकित करने का कुत्सित  प्रयास किया. उन्होंने समीर वानखेड़े पर रिश्वत मांगने का आरोप भी लगाया और अत्यंत हास्यास्पद रूप से यह भी कहा कि समीर वानखेडे दलित नहीं मुस्लिम हैं  और उन्होंने अपनी नौकरी पाने के लिए दलित सर्टिफिकेट का गलत इस्तेमाल किया है. पाठकों की जानकारी के लिए बताते चलें कि  समीर वानखेड़े के पिता दाऊद कचरूजी वानखेड़े हिंदू थे और उन्होंने मुस्लिम महिला से शादी की थी लेकिन वह हिंदू बने रहे. उन्होंने  मुस्लिम बनना स्वीकार नहीं किया. इसलिए  धर्म परिवर्तन नहीं किया था और अपनी पत्नी को भी उसी तरह मुस्लिम बनाए रखा जिस तरह शाहरुख खान ने अपनी पत्नी गौरी को हिंदू बनाए रखा है, लेकिन बच्चे मुस्लिम हैं.  कुछ इसी तरह  और स्वाभाविक रूप से भी समीर वानखेडे हिंदू ही हुए. समीर वानखेड़े ने भी अपनी पहली शादी एक मुस्लिम महिला से की थी लेकिन पिता  की तरह  वह भी हिंदू  बने रहे और उन्होंने  धर्म परिवर्तन नहीं किया. तभी  से वह  नवाब मलिक जैसे कट्टरपंथी मुस्लिमों की आंखों की  किरकिरी बने हुए हैं.  बाद में समीर वानखेड़े ने तलाक के बाद  दूसरी शादी एक हिंदू महिला से की है, जो एक मराठी अभिनेत्री हैं.

 

लोगों  ने नवाब मलिक की बात को  बहुत गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि उन  का बॉलीवुड, अपराध जगत और राजनीति से अपवित्र रिश्ता जगजाहिर है और वह इस गठजोड़ में  समन्वय और संवाद स्थापित करने की एक कड़ी है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बॉलीवुड और अपराध जगत की सहायता करते हैं.  कुछ समय पहले ही उनके दामाद समीर खान को भी ड्रग कारोबार के सिलसिले में एनसीबी ने  गिरफ्तार किया था , जो  हाल ही में जमानत के बाद जेल से बाहर आया है.

 

बात यहीं नहीं रुकी,  शरद पवार भी मैदान में आ गए और उन्होंने केंद्र सरकार पर अपने विरोधियों को शांत करने के लिए  केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया उन्होंने एनसीबी  के क्षेत्रीय प्रमुख समीर वानखेड़े को अप्रत्यक्ष रूप से धमकाया भी . उनका दर्द समझा जा सकता है क्योंकि उनके पार्टी के महाराष्ट्र सरकार के गृहमंत्री पर 100 करोड़ प्रतिमाह  वसूली का सनसनीखेज आरोप है, जो प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होता है, जिसमें महाराष्ट्र सरकार के लगभग सभी घटक किसी न किसी रूप जुड़े हैं.  समझा जा सकता है कि इतना बड़ा वसूली कांड बिना पार्टी अध्यक्ष  शरद पवार की अनुमति  के नहीं किया जा सकता. वैसे भी पूरा देश शरद पवार को राजनेता के रूप में कम राजनीतिक व्यवसायी के रूप में ज्यादा जानता है. 

 

शिवसेना के बड़बोले नेता संजय राउत ने तो हमेशा की तरह फिल्मी अंदाज में बहुत अनाप-शनाप वक्तव्य दिए . स्वाभाविक रूप से इसके लिए उन्हें  भी  उद्धव ठाकरे की सहमति प्राप्त होगी. अगर सुशांत सिंह राजपूत और अरनव गोस्वामी मामले से इसकी तुलना करें तो इस तंत्र के सभी लोगों की कथनी और करनी में विरोधाभास स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जो उनके छिपे एजेंडे को भी उजागर करता है.

 

 समीर वानखेड़े के विरुद्ध नवाब मलिक द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच के लिए नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने एक 5 सदस्य टीम गठित कर दी है जो शीघ्र ही मुंबई पहुंच कर आरोपों की जांच करेगी लेकिन इस बीच हिंदी फिल्मों की तरह पूरी कहानी में नए नए मोड़  दिए जा रहे हैं. एक घटनाक्रम में कथित रूप से शाहरुख खान की मैनेजर पूजा ददलानी ने एनसीबी  के एक गवाह को तोड़ लिया जिसने समीर वानखेड़े के विरुद्ध एक नया आरोप गढ़ दिया गयाजिसके अनुसार समीर वानखेडे ने आर्यन खान के पास से कोई ड्रग इसलिए बरामद  नहीं दिखाई ताकि शाहरुख खान से पैसे वसूल करके  उसे छोड़ा जा सके. सच्चाई जो भी हो लेकिन प्रथम दृष्टया इन आरोपों में बॉलीवुड हिंदी फिल्मों की पटकथा ही अधिक दिखाई पड़ती है, जिसमें रोचकता तो हो सकती है लेकिन सच्चाई नहीं.

 

इस बीच एक अन्य घटनाक्रम में जब भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान से अपना मैच हार गई तो कई शहरों में पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाते हुए पटाखे छोड़े गए. पहले यह यदा-कदा केवल कश्मीर में ही होता था फिर कुछ अन्य राज्यों में पहुंचा और अब तो ज्यादातर बड़े शहरों में इस तरह के जश्न मनाए जाने की खबरें आती हैं. इसका जिक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि यह दोनों घटनाएं आपस में एक कड़ी से जुड़ी है और वह खड़ी है जिहाद और इसे जानते हुए भी अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए  बढ़ावा देते राजनीतिक दल, कुछ चुनिंदा संस्थाएं और बिके हुए लोग.  यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज कई फिल्मों में नशे के कारोबारियों, अपराधियों, आतंकवादियों और राजनीतिज्ञों की अवैध कमाई का पैसा लगता है, और फिर इस निवेश के मुनाफे  का उपयोग राजनीतिक सत्ता हासिल करने, धर्मांतरण करव़ाने, और अन्य देश विरोधी गतिविधियों में किया जाता है.

 

एक और जहां फिल्म उद्योग के  नकली नायक छोटे और बड़े पर्दे पर तंबाकू, पान मसाला, शराब और अन्य हानिकारक वस्तुओं का विज्ञापन करके लोगों को दिग्भ्रमित करने का काम करते हैं, वहीं दूसरी ओर नशे के कारोबारी इन्हीं नायकों के बच्चों का उपयोग नशे का कारोबार बढ़ाने के लिए  करते हैं, ताकि इस देश की युवा पीढ़ी को नर्क में झोंकने  की कीमत पर भी फायदा कमाया जा सके. इन नायको और नशा कारोबारियों का ध्येय एक ही है. नशे की इस कारोबार में वैश्विक रूप से ज्यादातर आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं और इसलिए नशे की इस कारोबार से बनाया गया पैसा आतंकवादी गतिविधियों और देश तोड़ने वाले अभियानों में किया जाता है.

 

आज न केवल इस पूरे गठजोड़  से सावधान रहने की आवश्यकता है वरन राष्ट्र को बचाने के लिए इनके षड्यंत्र को विफल करने और सच्चाई देश के सामने लाने की अत्यंत आवश्यकता है. देश बचेगा तभी हम बच सकेंगे.

- शिव मिश्रा 

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लेखक आर्थिंक सामाजिक और समसामयिक विषयों के लेखक हैं.

 

Thursday, October 21, 2021

कश्मीर में टारगेट किलिंग का सच

 

कश्मीर में १९९० के दशक की दस्तक


कश्मीर में एक बार फिर वही सब कुछ शुरू हो गया है जो 1990 में हो रहा था . पिछले 15 दिनों में 11 से अधिक व्यक्तियों की हत्यायें  हो चुकी है जिसमें से पांच व्यक्ति  बाहरी  हैं. इसका उदेश्य घटी में दर पैदा कर हिन्दुओं और सीखो का पलायन कराना है.   तब और अब में एक बहुत बड़ा अंतर यह है कि पहले अलगाववादियों और आतंकवादियों को धारा 370 का संवैधानिक कवच प्राप्त था जो अब नहीं है लेकिन इस सच्चाई से भी शायद ही कोई इंकार करें कि धारा 370 हटाने के बाद
, लगातार जो किया जाना चाहिए था उसकी गति अत्यधिक धीमी हो गयी  है. जम्मू कश्मीर के ज्यादातर नेता जिन्होंने अतीत में अलगाववाद को बढ़ावा दिया, राज्य को दिए जा रहे वित्तीय संसाधनों का व्यक्तिगत स्वार्थ में दरुपयोग  और अलगाववादियों को फायदा पहुंचाने के लिए अपहरण किया, उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया है. इनमें से कई  पूरी शक्ति और सामर्थ्य के साथ जहर उगल रहें हैं  लेकिन केंद्र और केंद्र शासित प्रदेश की सरकार ने इस पर आंखें बंद कर रखी हैं । महबूबा मुफ्ती जैसे नेता जो पूर्व में मुख्यमंत्री रह चुके हैं प्रत्यक्ष रूप से अलगाववाद और पाकिस्तान की करतूतों का समर्थन कर रहे  हैं. यह समझना मुश्किल नहीं है कि जब पूर्व मुख्यमंत्री और जम्मू कश्मीर के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी विघटनकारी और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले बयान दे रहे हैं तो सरकार के निचले स्तर पर क्या हो रहा होगा. घाटी के कई राष्ट्रवादी नेता सरकार को लगातार असलियत बता रहे हैं और सरकार से अनुरोध कर रहे हैं कि तुरंत उचित कदम उठाए जाएं लेकिन संभवत सरकार वैश्विक बिरादरी के दबाव में महत्व पूर्ण र्और निर्णायक  कदम उठाने में संकोच कर रही है.

 

जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने के बाद राज्य के पहले उप राज्यपाल के नियुक्त एक  एक सलाहकार बसीर अहमद खान को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है, उन पर वित्तीय संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप है. असलियत यह है कि वह राज्यपाल के सलाहकार के रूप में भी  अलगाववाद और विघटनकारी तत्व को मजबूत करते रहें और उन्होंने राज्य सरकार के एक अंग के रूप में ऐसी नीतियां लागू करने का कार्य किया जिससे धारा 370 खत्म होने के बाद कश्मीरी पंडितों, दलित  हिंदुओं और सिखों को  मिलने वाले लाभ से वंचित किया जा सके. सरकारी भर्तियों, स्कूल कॉलेज और विश्वविद्यालय में प्रवेश में वही सब कुछ हो रहा है जो धारा 370 खत्म होने के पहले हो रहा था. पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के करीबियों में गिने जाने वाले बसीर अहमद खान का नाम कई घोटालों में पहले भी नाम आता रहा है। उन पर भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद के कई आरोप लग चुके हैं। जब उन्हें उपराज्यपाल का सलाहकार बनाया गया था, तो कई लोगों ने इस पर सवाल उठाया था लेकिन केंद्र सरकार ने अनदेखा कर दिया था.

 

बशीर ने न केवल जम्मू कश्मीर के आंतरिक मामलों में पहले की नीतिया  जारी रखी वरन वह अलगाववादियों और पृथकतावादी नेताओं को सरकार की आंतरिक जानकारी भी उपलब्ध कराते रहें. इस सब का परिणाम यह हुआ कि केंद्र सरकार द्वारा घाटी में किए जाने वाले आंतरिक सुधारों की धार कुंद बनी रही. आश्चर्यजनक यह  हैं कि  किसी भी उपराज्यपाल को ऐसे कारनामों की कानों कान खबर भी  नहीं लगी. दुर्भाग्य से ऐसे अनेकों बशीर अहमद खान जम्मू कश्मीर के प्रशासन में अभी भी राष्ट्र विरोधी कार्य कर रहे हैं  है.  ये सभी  केंद्र सरकार के प्रयासों में रोड़ा   बने हुए हैं  और  केंद्र और राज्य सरकारों के  प्रयासों पर पानी फेर रहे हैं जिसके कारण  कश्मीरी पंडित और अन्य विस्थापित लोग आज भी अपने उद्धार  का इंतजार कर रहे हैं.

 

भारतीय प्रशासनिक सेवा के उत्तर प्रदेश  के एक वरिष्ठ अधिकारी मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन ने  कानपुर के मंडलायुक्त रहने के दौरान सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग करके धर्मांतरण को एक नया आयाम दिया.  उन्होंने कई आपत्तिजनक किताबें लिखी और अपने सरकारी आवास में धर्मांतरण के लिए सभाएं आयोजित की और उसमें धर्मांतरण के लिए  तकरीरें की.  सालों तक केंद्र और प्रदेश सरकार को इसकी खबर भी नहीं  लगी. इसका खुलासा तब हुआ जब मंडला आयुक्त आवास में उनके द्वारा की गई तकरीरों के वीडियो वायरल हुए.  एक हिंदूवादी संगठन ने इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से की जिन्होंने तुरंत  इसकी जांच के लिए  एसआईटी  गठित की.  एसआईटी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट दे दी है और समझा जाता है कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के अध्यक्ष मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन के विरुद्ध ज्यादातर आरोपों की पुष्टि हो चुकी है. जम्मू कश्मीर के एक सामाजिक कार्यकर्ता उत्तर प्रदेश के इस वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की इन काली करतूतों को बेहद मामूली बताया क्योंकि जम्मू कश्मीर में ज्यादातर सरकारी कार्यालयों  में इस तरह की तकरीरें बहुत आम बात है. ज्यादातर  बड़े सरकारी कार्यालयों  में मस्जिदें बनी  हैं और वहां इस तरह के कार्यक्रम प्राय:  होते रहते हैं.

 जम्मू कश्मीर में  शुक्रवार को सरकारी कार्यालयों  में छुट्टी का माहौल रहता है और  दोपहर के बाद तो  सन्नाटा छा जाता है इसलिए शुक्रवार यहाँ अभी भी  अघोषित रूप से हाफ डे होता है. धर्मांतरण और हिंदू व सिख लड़कियों का अपहरण करके जबरन निकाह करना अभी बदस्तूर जारी है. हाल ही में एक सिख लड़की को जबरन उठाकर एक अधेड़ उम्र के पहले से ही विवाहित  मुस्लिम  के साथ निकाह कर दिया गया था और लड़की के मां-बाप के तमाम प्रयासों के बावजूद पुलिस मुस्लिम व्यक्ति को बचाने की हर संभव कोशिश करती रही. जब मामले ने ज्यादा तूल पकड़ा और दिल्ली से भी कई सिख  संगठन के लोग वहां पहुंचे, तब जाकर लड़की को उसके उसके मां-बाप को सौंपा जा सका. आश्चर्य जनक रूप से पुलिस ने ही इस लडकी को छुपा रखा था.   स्वयंसेवी संगठनों की मदद से उस लड़की का तुरंत सिख परंपरा के अनुसार विवाह कर दिया गया ताकि आगे कोई कानूनी अड़चन न रहे. आज भी इस अपराधी के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं हो सकी है. इस तरह की  अनेक घटनाएं पहले की तरह अभी भी हो रही है और केंद्र शासित प्रदेश के उपराज्यपाल को इसकी सूचना भी नहीं हो पाती है क्योंकि पूरा तंत्र पहले की मानसिकता से परिपूर्ण है और उसी तरह काम कर रहा है. जब तक इस तंत्र के षड्यंत्र की कड़ियों को तोड़ा नहीं जाता, राज्य में धरातल पर किसी व्यापक सुधार की आशा नहीं है. जम्मू कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते राज्य सरकार के कर्मचारियों को अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में अदला-बदली की जानी चाहिए ताकि प्रशासन में शुचिता और पारदर्शिता आ सके और धरातल पर हो रहे कार्य की सही सूचनाएं उपराज्यपाल और केंद्र तक पहुंच सके.

 

घाटी में इस समय "टारगेट किलिंग "  का जो अभियान चलाया जा रहा है वह पाकिस्तान पोषित अवश्य है लेकिन इसमें पाकिस्तानी आतंकवादियों की संख्या सीमित और   स्थानीय आतंकवादियों की  संख्या बहुत अधिक है . इस अभियान की  रणनीति भी इस मामले में सर्वथा भिन्न है  और इसे अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक जिहादी तत्वों का वित्तीय समर्थन भी अबाधित रूप से  उपलब्ध हो रहा है जो अधिकांश  हवाला के जरिए पहुंचाया जा रहा है.  यह सही है कि इन सब घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ है लेकिन महबूबा मुफ्ती जैसे कई नेता इन तथाकथित भटके हुए बच्चों से बात शुरू करने की वकालत कर रहे हैं. अनेक  राजनीतिक दल और संगठन पाकिस्तान के साथ भी पुनः बातचीत शुरू करने की  दलीलें दे रहे हैं. 1990 में हिंदुओं के नरसंहार के लिए चलाए गए अभियान से अलग इस बार  फर्जी नामों  से कई संगठन खड़े किए  गए हैं और इन्हें ज्यादातर स्थानीय लोग शामिल हैं, जो आतंकवादी, जिहादी या स्लीपर सेल के रूप में सक्रिय हैं और इन सभी के सम्मिलित प्रयासों से  टारगेट किलिंग की जा रही हैं . इन हत्याओं से घाटी में आतंक  का माहौल बनना शुरू हो गया है और इस कारण  दूसरे राज्यों से काम पर आने वाले कर्मचारियों और मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है.

 

भारत में इस समय धर्मांतरण, लव जिहाद और  आक्रामक इस्लामिक  गतिविधियां अपने चरम पर हैं और  शायद ही कोई ऐसा राज्य हो जहां धर्मांतरण, लव जिहाद और जिहादी आतंकवाद के स्लीपर सेल कार्य न कर रहे हो. समूचा विपक्षदेश हित की बातों में भी मोदी विरोध देखता है जो अप्रत्यक्ष रूप से से इन देश विरोधी गतिविधियों को संरक्षण प्रदान करता है. इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं कि इन गतिविधियों में मुस्लिम वर्ग के पढ़े-लिखे तबके के लोग भी बढ़-चढ़कर शामिल हो रहें  हैं. पूरे देश में एक सुनियोजित और संगठित अभियान के अंतर्गत किसी न किसी रूप में इस्लामिक जिहाद के बीज बोए जा रहे हैं और मुस्लिम समाज के तथाकथित प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति मोदी और भाजपा विरोध के नाम पर प्रत्यक्ष रूप से इनका समर्थन करते हैं. इनमें रंगमंच, फिल्म उद्योग, खेल जगत, उद्योग - व्यापार, कला साहित्य और लगभग हर क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के लोग शामिल हैं. सबसे निराशाजनक पहलू यह है कि शायद ही कोई प्रबुद्ध  मुस्लिम वर्ग का व्यक्ति हो जो राष्ट्रहित में इस तरह की गतिविधियों की निंदा करता हो और अगर ऐसे लोग हैं तो उन्हें अंगुलियों पर गिना  जा सकता है. ऐसा क्यों हो रहा है, यह भी किसी से छिपा नहीं है लेकिन इसे रोकने की दिशा में विपक्षी राजनीतिक दल  तो शायद  कभी मुंह नहीं खोलेंगे किन्तु  इस तरह के वातावरण को रोकने के लिए मदरसों द्वारा दी जा रही धार्मिक शिक्षा पर अंकुश लगाने के साथ-साथ धार्मिक गतिविधियों पर भी पैनी नजर रखने की अत्यंत आवश्यकता है  और यह कार्य भाजपा को ही अपने साहस और सामर्थ्य के दम पर करना पड़ेगा. यह कार्य जितनी जल्दी शुरू हो उतना ही देश हित में होगा अन्यथा स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं.

अगर जम्मू कश्मीर में सरकार ने तुरंत कोई कठोर कदम नहीं उठाये  तो उसके किए कराए पर पानी फिर जाएगा. जम्मू-कश्मीर कैडर के एक पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फैजल जिन्होंने कभी संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में टॉप किया था यद्यपि यह विवादों से घिरा है, ने कुछ समय पहले त्यागपत्र देकर अपना नया राजनीतिक दल बनाया था. उन्होंने न केवल धारा 370 हटाने का  बल्कि संशोधित नागरिकता कानून का भी जोरदार विरोध किया था. सरकार ने उनका पासपोर्ट जप्त कर हिरासत में रखा था और बाद में रिहा कर दिया था. आज भी भारतीय प्रशासनिक सेवा से उनका त्यागपत्र सरकार ने स्वीकार नहीं किया है. बीच में अफवाह उड़ी कि सरकार उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने वाली है इस तरह की बातों से न केवल  जम्मू कश्मीर के राष्ट्रवादी तत्वों की भावनाएं आहत होती  है बल्कि  पूरे भारत में एक गलत संदेश जाता है. अनुत्तरित प्रश्न है कि सरकार ने अब तक उनका इस्तीफा स्वीकार क्यों नहीं किया है. इस पूरे प्रसंग से घाटी में नौकरशाही   में भी गलत संदेश गया है और वह पहले की तरह ही अपने देश विरोधी गतिविधियों में  संलग्न है.

 

1990 में घाटी कश्मीरी पंडितों के नर संहार और पलायन के बाद जनसंख्या घनत्व पूरी तरह जिहादी तत्वों के हाथ में आ चुका है. इसके बाद से घाटी के राजनीतिक दलों ने जम्मू को निशाना बनाना शुरू किया और बंगलादेशी घुसपैठियों को वहां बसाना शुरु कर दिया. महबूबा मुफ्ती के शासनकाल  में बड़ी संख्या में रोहिंग्याओं और बांग्लादेशी घुसपैठियों को  तावी नदी के तटों पर सरकारी भूमि पर अनधिकृत रूप से कब्जा करवाया गया था.  महबूबा मुफ्ती ने  प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देशित किया था की अनधिकृत भूमि पर काबिज मुस्लिम समुदाय के लोगों पर कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी. ऐसा तब हुआ जब भाजपा भी सत्ता में साझीदार थी. केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद और  रोहिंग्याओं  के खिलाफ अभियान चलाने के बावजूद अभी तक सरकारी भूमि को मुक्त नहीं कराया जा सका है.  आश्चर्यजनक बात यह है कि म्यामार से भगाए गए रोहिंग्या मुस्लिमों को बांग्लादेश ने अपने यहां शरण देकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की थी. बांग्लादेश की रणनीति थी यह सारे रोहिंग्या धीरे-धीरे करके भारत चले जाएंगे और वैसा ही हुआ. बांग्लादेश आए  ज्यादातर रोहिंग्या शरणार्थी भारत के ज्यादातर शहरों में टुकड़ों टुकड़ों में पहुंचकर बस चुके हैं. इसका सबसे बड़ा कारण है बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल सीमा पर बरसों से चलने वाला गोरखधंधा. बताया जाता है कि 500 से 5000 रुपया देकर कोई भी बांग्लादेश की तरफ से भारत की सीमा में प्रवेश कर सकता है. कहना अनुचित  नहीं होगा  की बांग्लादेश सीमा पर तैनात  सुरक्षा बल भी भ्रष्टाचार के कारण गजवा ए हिंद को समर्थन कर रहे हैं. भारत-पाकिस्तान सीमा से आतंकवादियों की घुसपैठ पर पूरी तरह से लगाम लगाना मुश्किल काम हो सकता है लेकिन क्या भारत-बांग्लादेश सीमा से अवैध घुसपैठ को रोकना  बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है. दुर्भाग्य  से  इस दिशा में कोई खास प्रगति दिखाई नहीं पड़ती.

 

केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी को यह समझना होगा कि वह चाहे जो भी कर ले उसे "सबका (मुस्लिमों का) विश्वास" प्राप्त नहीं हो सकता लेकिन सबके  विश्वास के चक्कर में उसे बहुसंख्यक वर्ग का विश्वास खोना पड़ सकता है. इससे राष्ट्र का बहुत बड़ा नुकसान होगा. आज 70 साल बाद जब किसी राष्ट्रवादी पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिला है तो उसे इस सुअवसर को राष्ट्रीय अखंडता, अस्मिता और  एकता सुनिश्चित करने में  उपयोग करना चाहिए. ऐसा करने से ही पार्टी और सरकार को मजबूती मिलेगी और भविष्य में जनता का अत्यधिक  समर्थन पाकर और ज्यादा  दमखम से सरकार बनाने का मौका  मिलेगा और लगातार मिलता रहेगा. अगर भारतीय जनता पार्टी भी तुष्टिकरण के दुष्चक्र में फंस गई तो इससे बड़ा देश का  दुर्भाग्य और कुछ  नहीं हो सकता.

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- शिव मिश्रा 

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Wednesday, October 13, 2021

लखीमपुर खीरी की घटना के निहितार्थ

 


लखीमपुर खीरी में घटी घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन इस घटना ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि भारत में राजनीतिक हित हमेशा  राष्ट्रीय हितों से हमेशा ऊपर रखे जाते हैं और  राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते हैं। यहां तक कि मानवीय संवेदनाएं भी उनके लिए कोई महत्व नहीं रखती।

 

बताया जाता है कि लखीमपुर खीरी में घटी घटना के पीछे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा का दिया गया एक तथाकथित विवादास्पद बयान है जिसमें उन्होंने कहा था कि किसानों को सुधार देंगे। बस इसी बात को लेकर स्थानीय किसान नेता उनका विरोध करना चाहते थे और उन्हें काले झंडे दिखाना चाहते थे लेकिन बात इतनी बढ़ गई जिसमें चार  किसान, दो भाजपा कार्यकर्ता, एक मंत्री अजय मिश्रा की गाड़ी का ड्राइवर और एक पत्रकार की मौत हो गई। यह बात सुनने में  तो बहुत साधारण लगती है लेकिन  है नहीं।

 

इस घटना में हुई 8 मौतें  बेहद दुखद है और यह  हिसाब-किताब लगाना कि इसमें कितने किसान थे,  कितने भाजपा के कार्यकर्ता थे और कितने पत्रकार थे, बिल्कुल बेमानी है।  दुर्भाग्य से अपने लाभ के लिए सभी राजनीतिक दलों ने लाशों और मानवीय संवेदनाओं का बंटवारा कर लिया, जिसमें राजनीतिक लाभ मिल सकता था उनके लिए तो धरना प्रदर्शन और राजनीतिक पर्यटन बन गया  लेकिन जिन बातों से  राजनीतिक दलों को कोई फायदा नहीं था वह कहीं चर्चा में भी नहीं आई। बताने  की आवश्यकता नहीं कि घटना में मारे गए एक पत्रकार, ड्राइवर और  भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए किसी भी राजनीतिक दल ने  न तो कोई संवेदना प्रकट की है और न ही कोई इनके घर पर दिखावे के लिए ही पहुंचा। विशुद्ध हाथरस- कांड के आधार  पर लखीमपुर खीरी में भी राजनीतिक पर्यटन शुरू हुआ और सपा, बसपा, कांग्रेस और आप जैसे दलों ने वोटों के लालच में जो कुछ भी संभव था, सब  किया और इसके लिए सभी मर्यादाओं और मानवाधिकारों को तिलांजलि दे दी।

 

 घटना में मारे गए 4 किसानों के ऊपर कथित रूप से केंद्रीय राज्य  मंत्री अजय मिश्रा के पुत्र आशीष मिश्रा ने गाड़ी चढ़ाकर कुचल दिया था, जिसके बाद  गाड़ी में बैठे दो भाजपा कार्यकर्ता और एक ड्राइवर को तथाकथित किसानों की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। एक पत्रकार भी इन किसानों के हत्थे चढ़ गया उसे  भी बहुत बेरहमी से पिटाई करके मौत के घाट उतार दिया गया।गाड़ियां फूंक दी  गयीं । यह सब बिना पूर्व तैयारी के  नहीं किया सकता था । इस घटना के संबंध में कई वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुए, लेकिन उन्ही  वीडियो का संज्ञान लिया गया और उनका   दुष्प्रचार किया गया जिससे  सरकार को किसान विरोधी ठहराया  जा सके। एक वायरल वीडियो में ड्राइवर से जबरन यह कहलवाने  की कोशिश की जा रही है कि उसे मंत्री ने अपनी गाड़ी से किसानों को कुचलने के लिए भेजा था  लेकिन एक बेहद गरीब परिवार से संबंध रखने वाले इस ड्राइवर ने यह जानते हुए भी कि उसकी न उसकी मौत का कारण बन सकती है, यह झूठ स्वीकार नहीं किया और फिर उसे बेहद बेरहमी से पीट पीट कर मार डाला गया। इस घटना में मृत  ड्राइवर और पत्रकार दोनों  बेहद गरीब परिवार से संबंध रखते हैं लेकिन राजनीतिक फायदे  की लूट के इस युग में किसी भी राजनीतिक दल ने इन दोनों के घर न तो  जाना उचित समझा और ना ही उनकी मौत की निंदा की क्योंकि वोटों का फायदा तथाकथित  किसानों के साथ खड़े होने में  ही है

 

                                           

                                                 ( बेहतरीन अदाकारी के क्षण )

कांग्रेस की  प्रियंका वाड्रा और राहुल गांधी दोनों ने ही लखीमपुर खीरी को हाथरस बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हास्यास्पद नाटकीयता का पर्याय बने सिद्धू ने  दोषियों की गिरफ्तारी न होने तक आमरण अनशन शुरू  कर दिया। कांग्रेस ने यहां दलित कार्ड खेलने की भी भरपूर कोशिश की। राहुल के साथ तो पंजाब और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भी साथ गए और उन्होंने घटना में मारे गए किसानों के लिए राज्य सरकार की ररफ  ५० लाख रुपये की सहायता राशि की घोषणा की, जो उ.प्र. सरकार द्वारा घोषित ४५ लाख रुपये से ज्यादा है। इसका उद्देश्य पंजाब की राजनीति साधना ज्यादा है ।   उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ में पुलिस द्वारा कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। काग्रेस शासित राजस्थान में भी हनुमानगढ़ जिले में एक दलित की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और नृशंशता की सारी सीमाएं तोड़ते हुए उसके मृत शरीर को उसके घर घर में  परिवार वालों के सामने फेंककर आतंकित किया गया लेकिन इस मामले में हीं कोई राजनीतिक पर्यटन नहीं हुआ और न ही कोई सहयता राशि दी  गयी। स्वाभाविक रूप से यह कार्य स्वयं कांग्रेश स्वयं तो नहीं कर सकती थी, किंतु अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मामले में कोई रुचि नहीं दिखाई क्योंकि वहां निकट भविष्य  में चुनाव नहीं होने हैं। निश्चित रूप से यह भाजपा की राज्य इकाइयों  की कमजोरी है जो इन दोनों ही प्रदेशों की इन घटनाओं को उचित तरीके से जनता के सामने ला भी नहीं सकी। 

 


                                                  ( गिद्ध राजनीति )

लखीमपुर  घटना को सबसे खतरनाक मोड़   देकर   ब्राह्मण ( हिन्दू)  बनाम सिख बनाने की कोशिश की गई क्योंकि इस क्षेत्र में सिखों के साथ  ब्राह्मण भी संख्या में ठीक-ठाक होने के साथ ही राजनीतिक रूप से प्रभावशाली भी हैं।  अजय मिश्रा के केंद्रीय राज्य मंत्री बनने के बाद से ही उन्हें निशाना बनाना शुरू कर दिया गया था ताकि इस क्षेत्र से उनके मंत्री होने का  राजनीतिक लाभ भाजपा को न मिल सके। चूंकि  उत्तर प्रदेश में चुनाव बहुत नजदीक है, और प्रदेश की जनता योगी आदित्यनाथ की कानून व्यवस्था और माफियाओं के विरुद्ध अपनाई गई नीति से काफी हद तक  संतुष्ट है, इसलिए   सभी राजनीतिक दल योगी की छवि बिगाड़ कर राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं। इसलिए पिछले काफी समय से लगभग सभी राजनीतिक दलों के निशाने पर योगी और मोदी है। प्रदेश में घटने वाली हर छोटी बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को तूल देकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने की कोशिश की जाती है ताकि  योगी की छवि को धक्का पहुंचाया जा सके और उनकी सरकार  पर प्रश्न चिन्ह  लगाया जा सके। लगातार  चल रहे किसान आंदोलन का राजनीतिक  उद्देश्य  तो किसी से छिपा नहीं है और उसका लक्ष्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव और बाद में लोकसभा चुनाव ही हैं।

 



                   

कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण पूजन का दौर शुरू हुआ था और इसके लिए सभी दलों ने विकरू  कांड में विकास दुबे इन काउंटर  की आड़ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ब्राह्मण विरोधी ठहराने की भरपूर कोशिश की थी। इसके साथ ही सभी दलों ने प्रदेश में  ब्राह्मणों की लगभग 14% जनसंख्या को लुभाने के लिए अनेक वायदों की झड़ी लगा दी है। सपा और बसपा में तो   भगवान परशुराम की मूर्तियां बनवाने में भी आपसी  होड़ है कि कौन कितनी ऊंची मूर्ति बना सकता है और कहां कहां बना सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से भाजपा सहित किसी भी राजनीतिक दल का कोई भी ब्राह्मण और दलित नेता लखीमपुर खीरी कांड में मारे गए शुभम मिश्रा ( ब्राहमण) और श्याम सुंदर (दलित)  के परिवार वालों को सांत्वना देने भी नहीं पहुंचा, मुआबजा तो बहुत दूर की बात है ।

 

 प्रदेश का  प्रबुद्ध वर्ग सबसे ज्यादा इस बात से चिंतित है कि  विधानसभा चुनाव तक उत्तर प्रदेश में होने वाली हर दुर्भाग्यपूर्ण घटना को राजनीतिक रंग दिया जाएगा और अनेक षड्यंत्रकारी घटनाएं भी प्रायोजित की जाएंगी लेकिन इसके बाद भी केंद्र और राज्य सरकार, इस संदर्भ में कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर पा रही  हैं।  किसान आंदोलन के संबंध में केंद्र और राज्य सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि किसी भी आंदोलन या विरोध को केवल अनदेखा करने से ही उसका समाधान नहीं हो जाता। इन आंदोलनों को समाप्त करने के लिए कोई न कोई नीतिगत निर्णय लेना होगा और तदनुसार कठोर कार्रवाई करनी पड़ेगी, आखिर कुछ लोगों के संवैधानिक अधिकारों की स्वतंत्रता के नाम पर सामान्य जनता के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। किसान आंदोलन से आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ सामान्य जनता की दैनिक गतिविधियां भी बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। यह बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकता और इससे जनता में सरकार के कमजोर होने का संदेश जा रहा है। इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के संदर्भ में न केवल केंद्र सरकार की साख में बट्टा लगा बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के व्यक्तिगत छवि को भी   गहरी चोट पहुंची है।

 

 दुर्भाग्य से  लखीमपुर खीरी में घटी घटना का स्वत संज्ञान लेने वाले और उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर असंतोष प्रकट करने वाले सर्वोच्च न्यायालय  भी किसान आंदोलन के संबंध में अब तक कोई न्यायोचित  निर्णय नहीं दे सका है और इस कारण आर्थिक नुकसान के अलावा सामान्य जनता के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार भी बाधित हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने संसद द्वारा  पारित तीनों किसान कानूनों पर रोक लगाने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं किया है इससे ऐसा लगता है कि न्यायालय सरकार पर तो बड़ी आसानी से चाबुक चला सकता है, तीखी टिप्पणियां कर सकता है लेकिन आंदोलनकारियों के विरुद्ध कोई भी सख्त  निर्णय देने में डरता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसा ही कुछ शाहीनबाग मामले में भी  किया गया था। देश की निचली अदालतों ने  जनता के  एक बहुत बड़े वर्ग का विश्वास पहले ही खो दिया है। उच्च न्यायालय भी उसी रास्ते पर  हैं लकिन  जनता का  विश्वास  अभी भी  सर्वोच्च न्यायालय पर है। अब   यह आशंका बलवती हो रही है कि यह विश्वास भी बहुत जल्दी न टूट जाए। पश्चिम बंगाल में चुनाव उपरांत हुई हिंसा, बलात्कार और आगजनी के मामले लगभग वैसे ही  थे जो देश के विभाजन के समय हुए  थे लेकिन दुर्भाग्य से सर्वोच्च न्यायालय ने इनका स्वत: संज्ञान नहीं लिया इसके विपरीत पश्चिम बंगाल की सरकार से संबंधित कई मुकदमों से  पश्चिम बंगाल से संबंध रखने वाले न्यायाधीशों ने अपने आप को  अलग कर लिया। इसके क्या मायने हो सकते हैं, समझना मुश्किल नहीं । इससे सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को अपूरणीय  क्षति पहुंची है और कम से कम प्रबुद्ध वर्ग में न्यायालय के प्रति सम्मान की भावना को गहरा आघात लगा है ।

 

गोरखपुर के मनीष हत्या कांड के बाद लखीमपुर खीरी और उसके बाद कुछ और........। इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का  उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक प्रस्तुतीकरण किया जाता रहेगा। यह भी हो सकता है कि कुछ घटनाओं का मंचन और प्रायोजन भी किया जाए। इस संदर्भ में सरकार को अत्यंत सतर्क रहने की आवश्यकता है और यह सुनिश्चित करना राज्य सरकार का दायित्व भी है कि राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए प्रदेश  को रंगमंच के रूप में प्रयोग करके प्रदेश की जनता को अनावश्यक परेशान न किया जाए।

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                                        - शिव मिश्रा 

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गोरखपुर हत्याकांड - पुलिस का क्रूर और अमानवीय रूप

 



गोरखपुर एक होटल में तलाशी के दौरान पुलिस की पिटाई के कारण वहां ठहरे एक व्यापारी की  मौके पर हुई मौत ने   पुलिस का वीभत्स चेहरा एक बार फिर उजागर कर दिया है.  व्यापारी गोरखपुर के  रामगढ़ ताल क्षेत्र के एक होटल में ठहरा था और पुलिस  उस होटल में तलाशी के लिए गई हुई थी. तलाशी लेने का कोई वैध कारण अभी तक किसी को समझ में नहीं आया है. कोई इसकी   कल्पना भी नहीं कर सकता है कि तलाशी के दौरान ऐसा क्या हुआ कि पुलिस को इस हद तक व्यापारी की पिटाई करनी पड़ी कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई.  

इस घटना ने प्रदेश का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया और विपक्ष ने हाथो हाथ इस मुद्दे को लपक लिया और फिर सियासी गतिविधियों का दौर शुरू हो गया. यद्यपि मुख्यमंत्री योगी  ने संवेदनशीलता को समझते हुए मामले को गोरखपुर से बाहर कानपुर स्थानांतरित कर दिया जहां व्यापारी का परिवार रहता है. जांच के लिए उच्च स्तरीय पुलिस दल गठित कर दिया गया है और घटना में शामिल सभी पुलिस वालों के विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है. मृतक की पत्नी को ₹50 लाख की सहायता राशि के अलावा कानपुर विकास प्राधिकरण में विशेष कार्य अधिकारी की नौकरी भी दी गई है. इस तरह विपक्ष द्वारा पूरे मामले को सियासी रंग देने के प्रयासों की हवा जरूर  निकल गई है लेकिन यक्ष प्रश्न है कि एसा हुआ क्यों?

 

 इस घटना ने जहां पुलिस सुधारों की अत्यंत पुरानी मांग को एक बार फिर से तरोताजा कर दिया है. जब भी कभी पुलिस द्वारा इस तरह की क्रूर, असंवेदनशील और अमानवीय घटनाओं को अंजाम दिया जाता है चारों तरफ पुलिस सुधारों की बातें होने लगती हैं . और फिर ऐसा लगने लगता है कि जैसे पुलिस का यह रवैया सिर्फ पुलिस सुधारों को लागू न होने के कारण है जो बिल्कुल भी सही नहीं है. आज भी पूरे भारत में पुलिस का रवैया वही है जो अंग्रेजों के जमाने में हुआ करता था.  यह भी हो सकता है कि सभी पुलिस वालों के लिए अंग्रेजों की समय वाली पुलिस एक आदर्श और स्वयं सुखदाई स्थिति हो लेकिन आज के लोकतांत्रिक परिदृश्य में इस तरह की पुलिस व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

 

 


                             (गोरखपुर के गुनाहगार )

आखिर ऐसा क्यों होता है कि पुलिस बल  लुटेरे और हत्यारों के रूप  में सामने आता है. इसके कई कारण स्पष्ट है जिन पर प्रहार करके फौरी तौर पर पुलिस की स्थिति को काफी हद तक सुधारा जा सकता है, लेकिन राजनीतिक कारणों से कोई भी सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाती है और इस तरह पुलिस का भयावह चेहरा जस का तस है. आइए इस पर चर्चा करते हैं कि ऐसा क्या किया जा सकता है जिससे पुलिस व्यवस्था में तुरंत कुछ सुधार किया जा सके.

 

 उत्तर प्रदेश सहित किसी भी राज्य की पुलिस अपने काम के प्रति न तो पूरी तरह समर्पित है और न ही दक्ष. इसका सबसे बड़ा कारण है पुलिस में बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टाचार और जब कभी इसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है, यह अपने चरम पर पहुंच जाता है जैसा कि हमने अभी मुंबई पुलिस के संदर्भ में देखा जहां  किसी विशेष व्यक्ति को जेल में डालने के लिए पुलिस राजनीतिक इशारों पर नाचते हुए कुछ भी कर सकती है और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी पुलिस व्यवस्था द्वारा राजनीतिक मांग पर मासिक  लक्ष्य  बनाकर वसूली की जाती है, लोगों की हत्या और अपहरण किए जाते हैं. ऐसी पुलिस व्यवस्था जनता के लिए सहायक नहीं आतंक से भी बदतर  है और इसी कारण सामान्य जनमानस पुलिस से बचकर रहने की हर संभव कोशिश करता है.

 

 जनता में पुलिस की भूमिका आज भी खलनायक की ही है. मजेदार बात यह है कि पुलिस की यह भ्रष्ट व्यवस्था इतनी लचीली है कि वह किसी भी राजनीतिक दल की सरकार के साथ सामंजस्य बना लेती है और उसके अनुरूप कार्य करने लग जाती है, लेकिन ऐसा करने में उसके अपने हित सबसे पहले होते हैं और राजनीतिक दल के साथ साथ उन्हें भी अपनी जेब  भरने की खुली छूट मिल जाती है. शायद इसीलिए कोई भी सरकार न तो पुलिस सुधार की दिशा में कोई कदम उठाती है और न ही पुलिस के विरुद्ध कोई सख्त कार्यवाही करती है. पुलिस सुधार  की बात भी ज्यादातर सेवा निवृत पुलिस अधिकारी ही करते हैं  जिन्होंने अपने कार्यकाल में इस दिशा में कुछ नहीं किया.  कुल मिलाकर आजादी के बाद से अब तक " चलता है" का  राजनीतिक रवैया बना हुआ है और इसी कारण अंग्रेजों की पुलिस और आज की पुलिस में कोई बहुत अंतर नजर नहीं आता जो कुछ सुधार नजर आता भी है वह सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव और सक्रियता के कारण ही है. जब कभी कोई सरकार थोड़ी बहुत सख्ती  करती है उसका भी थोड़ा बहुत असर पुलिस की  कार्यप्रणाली पर परलक्षित होता है.

 

पुलिस की  मुख्यतय: दो  समस्याएं हैं - एक पुलिसकर्मियों के व्यक्तिगत आचरण और दूसरा अनवरत  भ्रष्टाचार. इन दोनों के कारण ही  पुलिस  प्रोफेशनल नहीं हो पाती बल्कि स्वयं राजनीतिक गुलामी की जंजीरों से जकड़ी हुई जनता के शासक बनने का प्रयास करती रहती है. जब पूरा  तंत्र भ्रष्टाचार से लाभान्वित हो रहा तो   कोई नियंत्रण प्रणाली भी विकसित नहीं हो सकती और जिससे पुलिस की निरंकुशता बढ़ना  बहुत स्वाभाविक है. 

 

पुलिस में कम अवधि में व्यापक सुधार के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की अत्यंत आवश्यकता है और तभी निम्नलिखित परिवर्तन पुलिस व्यवस्था में किया जा सकता है.

 

 अंग्रेजो  के जमाने से लेकर आज भी पुलिस में सिपाही के लिए शैक्षणिक योग्यता केवल हाई स्कूल रखी गई है जो आजकल के वैश्विक परिवेश में लगभग अनपढ़ होने जैसी है. सेना और अर्धसैनिक बलों में  तो यह एक बार फिर भी स्वीकार्य है लेकिन पुलिस बल के लिए जिसका दिन-रात जनता से संपर्क होता हो, यह शैक्षणिक योग्यता बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है. अतः सरकार को सिपाहियों की भर्ती के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक कर देना चाहिए, और इस कारण भर्ती की न्यूनतम और अधिकतम आयु में परिवर्तन किया जा सकता है. ट्रेनिंग में व्यवहार विज्ञान का अधिकतम उपयोग किया जाना चाहिए और इसके साथ ही सिपाहियों के लिए आकर्षक करियर के लिए वर्तमान प्रमुख व्यवस्था में परिवर्तन करना  होगा. ट्रेनिंग व्यवस्था में शारीरिक दक्षता के अलावा अन्य विषयों की ट्रेनिंग को पूरी तरह से आउट सोर्स किया जाना चाहिए जिससे पूरे तंत्र में नए विचारों का संचार हो सके और उन्हें मालूम हो सके कि समाज के लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं और उनसे क्या अपेक्षा रखते हैं. सक्षम और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सिपाहियों को सेवा निवृत्ति तक पुलिस अधीक्षक पद तक पहुंचने में कोई भी बाधा नहीं होनी चाहिए. इस कारण उनका मनोबल ऊंचा रहेगा, उनकी सोच का दायरा विस्तारित होगा. उपनिरीक्षक जैसे पद सीधी भर्ती के बजाय प्रोन्नति के आधार पर भरे जाने चाहिए और अगर यह संभव ना हो तो कम से कम 50% पद प्रोन्नति के आधार पर भरने के लिए आरक्षित होने चाहिए. प्रोन्नत की यही व्यवस्था राज्य और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों पर भी लागू होनी चाहिए. किससे न केवल तंत्र में गति मिलेगी बल्कि पुलिस कर्मियों की कर्तव्य परायणता में निश्चित रूप से बढ़ोतरी होगी.

-    पुलिस तंत्र का सबसे पुराना और लगभग लाइलाज हो चुका मर्ज है भ्रष्टाचार जो अंग्रेजों के जमाने से आज तक न केवल बरकरार है बल्कि नित  नए आयाम स्थापित कर रहा है. ऐसे पुलिसकर्मी उंगलियों पर गिनने लायक होंगे जो भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होगे.  भ्रष्टाचार विरोधी कार्यवाही के दायरे में आए कई पुलिस अधिकारियों से मिले तक चौंकाने वाले हैं. कई अधिकारी केवल पांच से दस  साल सेवाकाल  में हजारों करोड़ की  संपति के मालिक  हैं. उत्तर प्रदेश में ही कई बड़े पुलिस अधिकारी, जिन पर भ्रष्टाचार और संगीन अपराधों के आरोप हैं,  फरार घोषित किए गए हैं, क्योंकि उ.प्र. की  दक्ष पुलिस उन्हें पकड़ने में असहाय है. कई पुलिस अधिकारियों पर आतंकवादियों के साथ सांठगांठ के आरोप प्रमाणित हुए हैं. इस दिशा में भी अत्यंत सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है.

प्रत्येक सीधी भर्ती के पदों पर, समुचित संख्या में कर्मियों की भर्ती करके प्रतीक्षा सूची बना ली जाए. भर्ती के विज्ञापन में स्पष्ट तौर पर इसकी घोषणा की जाए कि यह भर्ती प्रतीक्षा सूची बनाने के लिए है जिसे भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त किए जाने के बाद समायोजित की जाएगी. शुरुआत में यह संख्या बहुत अधिक हो सकती है क्योंकि मोटे तौर पर एक तिहाई पुलिस तंत्र भ्रष्टाचार में गंभीर रूप से जकड़ा  हुआ है, इनमें से   बड़ी संख्या में ऐसी कर्मी  है जिन्हें तुरंत निकाल बाहर करने की आवश्यकता है . इससे न केवल भ्रष्ट कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकेगा वरन  दूसरे पुलिस कर्मियों को भी उदाहरण पेश किया जा सकेगा. एक बात हमेशा याद रखी जानी चाहिए कि सरकारी नौकरी की सुरक्षा ऐसा कवच है जो कर्मचारियों की उत्पादकता घटाता है और उन्हें भ्रष्ट रास्ते पर जाने के लिए प्रेरित करता है इसलिए सेवा शर्तों में व्यापक सुधार की आवश्यकता है ताकि अवांछित और सिफारिश के आधार पर आए अक्षम  कर्मियों को बिना समय गवाएं  निकाल बाहर किया  जा सके.

 

इस तरह पुलिस व्यवस्था में तुरंत परिवर्तन दिखाई पड़ने लगेगा और इसके बाद व्यवस्थित रूप से व्यापक विचार-विमर्श के बाद पुलिस या अन्य तरह के सुधार किए जा सकते हैं.

 

यह भी बात ध्यान रखने योग्य है कि  जैसे खरबूजा  को देखकर खरबूजा रंग बदलता है, विभिन्न विभाग भी इसी तरह भ्रष्टाचार की चपेट में आते हैं. अन्य विभाग जहां जनता का सबसे अधिक कामकाज पड़ता है वहां के भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए.   उत्तर प्रदेश में इस तरह के  विभागों की पहचान मुश्किल नहीं है, - परिवहन विभाग, रजिस्ट्री ऑफिस, तहसील / कचहरी आदि इसके निकृष्टतम  उदाहरण है.   इन विभागों में पासपोर्ट कार्यालय में अपनाई जाने वाली आउटसोर्सिंग सहित  इस तरह के परिवर्तन तुरंत किए जाने की आवश्यकता है अन्यथा भ्रष्टाचार पर शायद कभी भी लगाम नहीं लगाई जा सकती.

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                             - शिव मिश्रा